एच एम ग्लोबल स्कूल संभल में मनाया गया सर सैयद अहमद खान का जन्मदिवस

सर सैयद डे कार्यक्रम एच एम ग्लोबल स्कूल संभल
सर सैयद डे कार्यक्रम एच एम ग्लोबल स्कूल संभल 

एच एम ग्लोबल स्कूल
एच एम ग्लोबल स्कूल संभल में सर सैय्यद अहमद खां का दोसौ दो वां जन्मदिवस बड़ी धूम धाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रबंधक शहज़ाद अहमद तुर्क साहब ने कार्यक्रम का आगाज़ किया। इस अवसर पर अधिवक्ता कमर हुसैन, डॉक्टर राशीक अनवर, मोहम्मद इमरान पाशा उर्फ़ बॉबी, अथर उल्लाह खान व मुग़ल फैज़ान ने कार्यक्रम के आयोजन में अपना पूरा सहयोग दिया ! कार्यक्रम में ४०० से अधिक लोगों ने शिरकत करके इसको सफल बनाया! मुख्य अतिथि के तौर पर प्रोफेसर एम एम सुफ़यान बेग(प्रधानाध्यापक ज़ाकिर हुसैन इंजीनियरिंग कॉलेज), डॉक्टर फर्रुख खान (पूर्व सचिव एएमयूएसयु), सय्यद माज़िन हुसैन ज़ैदी (पूर्व उपाध्यक्ष एएमयूएसयु)  व अन्य अतिथि गण मौजूद रहे !

फर्रुख खान

इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए तथा सभी लोगों के लिए शाही डिनर का भी आयोजन किया गया। प्रबंधक शहज़ाद अहमद ने कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आये दूर-दूर के लोगों से  सर सैय्यद अहमद खां के स्वप्न को पूरा करने का आह्वान किया। डॉक्टर फर्रुख खान (पूर्व सचिव एएमयूएसयु) ने विद्यार्थियों को अपने अध्ययन में अधिक मेहनत के साथ अच्छे अंक लाकर सरसैय्यद खां का नाम रोशन करने का आह्वान किया। साथ ही साथ प्रोफेसर एम एम सुफ़यान बेग साहब (प्रधानाध्यापक ज़ाकिर हुसैन इंजीनियरिंग कॉलेज ) ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सर सैय्यद अहमद खां की तरह नए नए तकनीक कालेज खोलने का आह्वान किया। सय्यद माज़िन हुसैन ने भी फर्रुख खां की बात को आगे बढ़ाते हुए इल्म और सर सय्यद अहमद खान के देश के लिए योगदान का महत्त्व समझाया ! कार्यक्रम को सफल बनाने में एच एम ग्लोबल स्कूल प्रबंधन के साथ-साथ जावेद, अलमास, काशिफ, जुनैद, यासिर, असजद, वसीम, फैसल, आसिफ, राईस, ताबिश, लबीब, हारिस, मुस्तफा , फैज़ान, गुल मोहम्मद , सुभान, नावेद व कलीम अशरफ का सरहनीय योगदान रहा !


कौन हैं सर सैयद अहमद खां  ?

1857 की क्रांति के बाद के भारत का माहौल वही था, जो मधुमक्खियों के छत्ते का होता है. आग लगने के बाद. ब्रिटिश राज ने इसी माहौल में हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की पूरी कोशिश की थी. पहले तो दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों को मारा गया. कहा जाता है कि एक ही दिन में 22 हजार मुसलमानों को फांसी दे दी गई. फिर 10-15 साल बाद पॉलिसी चेंज कर दी गई. अब मुसलमानों को फेवर किया जाने लगा. पर मॉडर्न बनाने के लिये नहीं. सदियों के सड़े-गले नियमों के साथ ही जीने के लिये बढ़ावा दिया जाने लगा. *सैयद अहमद खान ने इसी माहौल में पहले तो खूब पढ़ाई की. फिर मुसलमानों को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिये कोशिश करने लगे.*
अब उनको अंग्रेज और इस्लाम के ठेकेदार दोनों से निबटना था.

 सरसैयद अहमद खान
सर सैयद अहमद खान जो लोगों के लिये के लिये एक नाम होसकता है, मगर सच ये है कि *सर सैयद एक ऐसा शख्स जो 200 साल पहले पैदा हुआ और 200 साल आगे की बात करता था*.


विरोधी कहते रहे कि ये आदमी अंग्रेजियत का मारा था. अंग्रेजी सिर में घुसी थी. पुराने जमाने के नॉस्टैल्जिक लोगों को ये इस्लाम को डुबाने वाले लगते थे. औरतों के बारे में इनके विचार को लेकर इनके ऊपर प्रश्न उठाये गये. किसी के लिये ये पहले आदमी बने, जिसने भारत को तोड़ दो देशों की कल्पना की थी. फिर किसी के लिये ये बातों से पलटने वाले आदमी बने. इस्लाम के ठेकेदारों के हाथ में नाचने वाले बने.

इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि मुगल राज खत्म होने के बाद मुसलमान समाज का अपर क्लास अस्तित्व बचाने के लिये लड़ रहा था. वहीं लोअर क्लास जो कि कारीगर था, ब्रिटिश इंडस्ट्रियल सामान के मार्केट में आने से बेरोजगार हो रहा था. उधर *बंगाल में राममोहन राय और उनके बाद के लोगों के कामों के चलते हिंदू समाज पढ़-लिख के नौकरियों में आ रहा था. तो अपने बादशाहों की शानो-शौकत को याद कर आहें भरने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था मुस्लिम समाज को*.

सैयद अहमद खान ने इसके लिये एक प्लान बनाया. साइंटिफिक सोसाइटीज, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट चलाने शुरू किये. साइंटिफिक चीजों का अनुवाद होने लगा. मैगजीन आने लगी, जिसमें सोशल रिफॉर्म पर बात हो रही थी. तरीका यही था कि अचानक से सब कुछ बदलने की बात ना कर ट्रेडिशन और मॉडर्निटी दोनों को एक साथ रखा जाये. और धीरे-धीरे बदला जाये.

अब अगर इस चीज को आज के नजरिये से देखें, तो यही लगेगा कि सैयद अहमद खान परंपरा को तोड़ने से डरते थे. फूंक-फूंक कर कदम रखते थे. जब मुसलमानों ने फ़ारसी ज़ुबान को अपनाना शुरू किया था तब सर सैयद खान अंग्रेज़ी सीखने को कह रहे थे, क्योंकि आने वाले जिस कल की तैयारी सर सैयद करना चाहते थे मुसलमानों के मुस्लिम रहनुमा उसको नही समझ रहे थे।

सैयद अहमद खान दोषी थे अपनी बात को प्यार से कहने के. क्योंकि वो सबसे लड़ना नहीं चाहते थे. ये उनका स्वभाव था. क्योंकि जब सर विलियम मियर ने Life of Mahomet लिख के इस्लाम के खिलाफ लिखा, तो सैयद अहमद खान ने गोलियां नहीं चलाईं बल्कि उनके दावों पर बहस करने इंग्लैंड गये.

सैयद अहमद खान का सबसे बड़ा योगदान था अलीगढ़ आंदोलन. 1859 में उन्होंने मुरादाबाद में गुलशन स्कूल खोला. 1863 में गाजीपुर में विक्टोरिया स्कूल खोला. 1867 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरियंटल स्कूल खोला. उसी दौरान वो इंग्लैंड भी गये. और वहां की एजुकेशन से बड़े प्रभावित हुये. लौटने के बाद अपने स्कूलों को वैसा ही बनाने की कोशिश करने लगे. ये स्कूल 1875 में कॉलेज बन गया. सैयद की मौत के बाद 1920 में ये यूनिवर्सिटी बन गया.

सैयद अहमद खान एक और जगह फंसे थे. उनका मानना था कि अपने हक के लिये मुसलमानों को अंग्रेजों के साथ मिलकर रहना चाहिये. य़े चीज उस वक्त के लोगों को नागवार गुजरती थी, क्योंकि लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने में बहुत कुछ गंवा दिया था.  फिर उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस जॉइन करने से मना भी किया. खुद को ऑफर मिलने के बाद भी नहीं गये. वजह दी कि पहले पढ़ाई जरूरी है. जब तक ब्रिटिश सिस्टम को समझेंगे नहीं, पार्टिशिपेट कैसे करेंगे.

सर सैयद का पूरा फोकस था मुस्लिम समाज को पढ़ाई के जरिये बदलने पर. किसी से गिला-शिकवा ना रहे. बल्कि अपने दम पर सब कुछ हासिल किया जाये. अगर ध्यान से देखें तो यही एप्रोच आज भी जरूरी है. अगर ISIS और आतंकवाद से निबटना है तो.

सर सैयद को अपने जीवन में ही मात खानी पड़ी. अल्लामा इकबाल पैदा हो चुके थे. और ये ले के आये इंकलाब की बातें. दीन-ईमान की बातें. शेर-ए-दिल बनने की बातें. वतनपरस्ती की बातें.
ये बातें सुनने में अच्छी तो थीं पर साइंस और रीजन से दूर थीं. बेहद इमोशनल और उत्तेजित करने वालीं. इसलिये धीरे-धीरे इकबाल मुसलमानों में लोकप्रिय होते गये और सैयद अहमद खान पीछे छूटते गये, क्यों के मुसलमानों को हर दौर में जज़्बाती बाते पसन्द आती है, अमली और मेहनत करने वाली राय को मज़हब से जोड़कर नकार दिया जाता है।

कोई चाहे कुछ भी कहे, सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के लिये जो सोचा था, वो आज भी सोचने वाले बहुत कम है। जो लोग काम करते है मुसलमान उनके कार्यों को छोड़कर उसके आचरण की आलोचना करने में लग जाता है। आज पूरे मुल्क में

मुसलमानों का कोई बड़ा अखबार या TV चैनल नही है, जो था भी वो बिक गया उनके हाथों में। कहने को तो हम 20 करोड़ है।

दूसरी जगह को छोड़िये मऊ को देखिये के यहा के उद्धयोग में मुसलमान सबसे आगे है, मगर एक भी आधुनिक कोचिंग या शिक्षण संस्थान कि कोई ब्यवस्था नही है, न कोई CBSE कॉलेज न लड़को का कोई डिग्री कॉलेज, न कोई तकनीकी संस्थान। मुसलमानों के तलमी इदारों में शिक्षक की नियुक्ति गुड़ दोष के हिसाब से न होकर रिश्तेदारी और दोस्ती की बुनियाद पर होती है।

चुप तमाशा देखने से बेहतर है कि आवाज़ तो उठे। जबतक अच्छे शिक्षक नही होंगे तबतक अच्छे छात्र कहा से पैदा होंगे।

(अरशद जमाल की कलम से)

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